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Shyamnagar Scheme Dispute- IAS Krishna Kunal gets relief from Consumer Court | श्यामनगर योजना…

राजस्थान राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने वरिष्ठ आईएएस अधिकारी और वर्तमान में महिला एवं बाल विकास विभाग के शासन सचिव कृष्ण कुणाल को आपराधिक अवमानना याचिका में बड़ी राहत दी है। आयोग के अध्यक्ष जस्टिस देवेन्द्र कच्छवाहा और सदस्य लियाकत अली ने वर्ष

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मामला जोधपुर के श्यामनगर योजना से जुड़ा है, जहां लक्ष्मण खेतानी नामक व्यक्ति को भूखंड संख्या 248, 249, 357, 404 और 423 का भौतिक कब्जा दिलाने के लिए 25 नवंबर 2006 को जिला उपभोक्ता आयोग ने आदेश दिया था। इस मामले में खेतानी ने तत्कालीन जोधपुर विकास प्राधिकरण के सचिव कृष्ण कुणाल और पी.आर. पंडित के खिलाफ आपराधिक अवमानना याचिका दायर की थी।

वर्ष 1997 से चला आ रहा है मामला

मामले की शुरुआत 1997 में हुई थी, जब नगर सुधार न्यास जोधपुर (वर्तमान में जोधपुर विकास प्राधिकरण) के सचिव ने अपने 9 जनवरी 1997 के प्रस्ताव संख्या 13(12) और राजस्थान हाईकोर्ट के 30 जनवरी 2002 के आदेश की पालना में लक्ष्मण खेतानी के साथ समझौता किया था। समझौते के अनुसार खेतानी की जमीन न्यास को समर्पित करने पर उन्हें बालोतरा रोड और चौपासनी रोड के मध्य स्थित श्यामनगर योजना में पांच भूखंडों का आवंटन किया जाना था।

खेतानी ने नियमन एवं विकास शुल्क के रूप में कुल 10 लाख 2 हजार 650 रुपए, पट्टा नजराना (प्रीमियम) के रूप में तथा लीज मनी के रूप में भूखंड आवंटन के लिए तीन वर्ष पर तय मूल्य 1725 रुपए प्रति वर्ग मीटर पर 2.5 प्रतिशत राशि जमा करवा दी थी। इसके बावजूद न्यास द्वारा उन्हें आवंटित भूखंडों का कब्जा नहीं दिया गया।

जिला आयोग ने माना उपभोक्ता सेवा में गंभीर त्रुटी का दोषी

खेतानी द्वारा वर्ष 2006 में दायर शिकायत पर जिला उपभोक्ता मंच (वर्तमान आयोग) ने 25 नवंबर 2006 को विस्तृत फैसला सुनाया था। आयोग ने नगर सुधार न्यास को उपभोक्ता सेवा में गंभीर त्रुटि व कमी का दोषी पाया और निर्देश दिया कि एक माह के भीतर खेतानी को आवंटित भूखंडों का भौतिक व शेष कब्जा दिया जाए। साथ ही मानसिक वेदना व क्षतिपूर्ति के लिए एक लाख रुपए हर्जाने और 1500 रुपए परिवाद व्यय भी अदा करने का आदेश दिया गया था।

आयोग में दो बार व सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी भी खारिज

इस निर्णय के खिलाफ न्यास द्वारा राज्य आयोग में अपील की गई, जो 5 मार्च 2008 को 5000 रुपए की कॉस्ट के साथ खारिज हुई। इसके बाद राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग में पुनरीक्षण याचिका दायर की गई, जो 15 अप्रैल 2010 को खारिज हुई। सुप्रीम कोर्ट में भी SLP दायर की गई, जो 6 सितंबर 2010 को खारिज हो गई।

राहत नहीं मिली, तो दायर की अवमानना याचिका

जिला आयोग के निर्णय की जानबूझकर अवहेलना करने के कारण खेतानी ने उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 की धारा 27 के तहत अवमानना याचिका दायर की। इसमें आईएएस पी.आर. पंडित और आईएएस कृष्ण कुणाल के विरुद्ध कार्यवाही की गई। दोनों अधिकारियों ने राजस्थान हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की, जो 13 मई 2013 और 16 मई 2013 को खारिज हुईं। स्पेशल अपील भी 11 दिसंबर 2015 को खारिज हो गई।

कृष्ण कुणाल की ओर से तर्क: संक्षिप्त कार्यकाल

आईएएस कृष्ण कुणाल के अधिवक्ता अनिल भंडारी ने कोर्ट में तर्क दिया कि कृष्ण कुणाल का जेडीए सचिव के रूप में कार्यकाल बहुत कम अवधि का था। उन्होंने खेतानी को भूखंड का कब्जा दिलाने की पूरी कोशिश की थी। खेतानी ने स्वयं 17 दिसंबर 2021 को जिला आयोग के समक्ष प्रार्थना पत्र दाखिल कर कृष्ण कुणाल का नाम अवमानना याचिका से हटाने की बात कही थी।

दिलचस्प बात यह है कि खेतानी ने एक माह बाद डाक से पत्र भेजकर नाम यथावत रखने का अनुरोध किया। जिला आयोग ने इस दूसरे पत्र को 10 हजार रुपए की कॉस्ट के साथ खारिज कर दिया, जिसे खेतानी ने जमा भी करवा दिया।

राज्य आयोग: मंशा व्यक्ति विशेष को दंडित कराने की

राज्य उपभोक्ता आयोग ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि खुद खेतानी की प्रार्थना पर ही आईएएस कृष्ण कुणाल के खिलाफ कार्यवाही ड्रॉप की गई है। आयोग ने पाया कि खेतानी की मंशा जिला आयोग के 25 नवंबर 2006 के निर्णय की पालना कराने की नहीं है, बल्कि व्यक्ति विशेष को दंडित कराने की है।

आयोग ने खेतानी के वकील द्वारा उठाए गए वाद का मास्टर (Dominus Litis) के तर्क को भी खारिज किया। कोर्ट ने कहा कि यह सिद्धांत केवल सिविल सूट के लिए माना जा सकता है, उपभोक्ता मामलों में नहीं।

राज्य आयोग ने स्पष्ट किया कि जिला आयोग के निर्णय में जोधपुर विकास प्राधिकरण को जो निर्देश दिए गए हैं, उनकी पालना जेडीए में पदस्थापित व्यक्ति द्वारा ही की जा सकती है, किसी भी सेवानिवृत्त अथवा स्थानांतरित अधिकारी द्वारा नहीं।

राज्य आयोग ने निष्कर्ष दिया कि जिला उपभोक्ता आयोग ने 14 दिसंबर 2023 को आदेश पारित करने में तथ्यों और विधि की कोई भूल नहीं की है। अतः निगरानी याचिका सारहीन होने के कारण खारिज की जाती है और जिला आयोग के निर्णय को पुष्ट किया जाता है।

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