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Extinct Pangolin found in Pali, rescued | पाली में मिला विलुप्त श्रेणी का पेंगोलिन, किया…

पाली जिले के बांता गांव में विलुप्त श्रेणी का पेंगोलिन आने पर उसका रेस्क्यू करते ग्रामीण।

पाली में विलुप्त प्राय श्रेणी का पेंगोलिन (चींटीखोर) जीव मारवाड़ जंक्शन क्षेत्र के बांता गांव में नजर आया। इस अनोखे जीव को ग्रामीणों ने भी पहली बार देखा। ऐसे में गांव की स्कूल में बनी प्याऊ में उसे बंद कर दिया। शनिवार सुबह वन विभाग की टीम पहुंची और रे

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पाली जिले के बांता गांव की गलियों में घूमता पेंगोलिन।

पाली जिले के मारवाड़ जंक्शन क्षेत्र के बांता गांव के उपसरपंच महेन्द्र कुमार ने बताया कि शुक्रवार रात को बांता गांव के मूलाराम माली के बाड़े के पास गली में पेंगोलिन नजर आया। इस अनोखे जीव को देख ग्रामीण भी डर गए। कुछ ही देर में बड़ी संख्या में ग्रामीण मौके पर जुट गए। जिन्हें देखकर पेंगोलिन ने खुद सुरक्षित करने के लिए गेंद जैसे बन गया। ऐसे में उसे गांव के स्कूल में बनी प्याऊ में बंद किया। शनिवार सुबह मारवाड़ जंक्शन रेंजर मारवाड़ जंक्शन रेंज के सुरेन्द्र सिंह के निर्देश पर वनरक्षक मुकेश कुमार, सहायक वनपाल उम्मेदसिंह बांता पहुंचे और पेंगोलिन को लेकर गए और फिर जंगल में उसे सुरक्षित छोड़ना। ग्रामीणों ने कहा कि उन्होंने अपने गांव में पहली बार पेंगोलिन देखने को मिला।

पाली जिले के बांता गांव में पेंगोलिन नजर आने पर मौके पर जुटे ग्रामीण।

ऐसा होता है पेंगोलिन वन विभाग पाली के DFO पी. बाला मुरगन ने बताया कि पेंगोलिन की पाली जिले में पांच-छह संख्या है। भारत के वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम 1972 की अनुसूची शामिल शेड्यूल फर्स्ट श्रेणी का जीव है। इस कारण इसे उच्चतम स्तर की सुरक्षा प्रदान है। इस कारण किसी भी रूप में शिकार, व्यापार या प्रजातियों या उनके शरीर के अंगों और इनसे तैयार उत्पादों का किसी अन्य रूप में उपयोग प्रतिबंधित है। इसकी जीभ लम्बी और चिपचिपाती होती है। जिसे दीपक और चीटियों के बिल में डालकर वह उनको अपना भोजन बनाता है। इस चींटीखोर भी कहते है। पेंगोलिन के आहार में चींटियां, दीमक, झींगुर, मक्खियां और अन्य कीट प्रजातियां शामिल हैं, इसलिए ये जानवर कीटों की अधिक आबादी को रोकने और जंगलों को दीमक के विनाश से बचाने में मदद करते हैं।

शल्क दार त्वचा से करता है खुद का बचाव दुनिया के सबसे अनोखे स्तनधारियों में से एक पेंगोलिन, बड़े पैमाने पर अवैध शिकार और व्यापार के कारण इनका अस्तित्व खतरे में है। हर फरवरी के तीसरे शनिवार को मनाए जाने वाले विश्व पेंगोलिन दिवस पर, धरती के पारिस्थितिकी तंत्र के इन छोटे, शल्कदार जीवों के प्रति अपना आभार प्रकट करने का दिन है और उनकी रक्षा करने के लिए प्रतिबद्धता जताने का भी दिन है। खतरा होने पर यह खुद को गेंद की बना लेता है। शल्क दार कठोर त्वचा होने के कारण लेपर्ड भी इसका शिकार नहीं कर पाता।

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